शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

Nayee Khabar

जातीय समीकरण साधने में जुटी कांग्रेस, यूपी चुनाव से पहले किये कई बड़े फैसले

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस प्रदेश में जातीय समीकरण साधने में जुट गयी है। किसी समय जातीय राजनीति से दूर रहने वाली कांग्रेस को भी आखिरकार प्रदेश में अपनी डूबती नैया को पार लगाने के लिये जातीय राजनीति का ही सहारा लेना पड़ा है।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार के तौर पर दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के नाम पर गुरुवार को पार्टी महासचिव जनार्दन द्विवेदी की मुहर के साथ यह बात साबित हो गयी है कि पार्टी जातीय राजनीति करने में अन्य दलों से किसी तरह पीछे नहीं है। इससे पहले मंगलवार को ग्लैमरस पहचान रखने वाले पुराने सपाई राज बब्बर को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के साथ ही चार वरिष्ठ उपाध्यक्षों के सहारे पार्टी नेतृत्व ने सभी दलों को प्रतिनिधित्व देकर जातीय समरसता का संदेश देने का प्रयास किया है।
प्रदेश में खुद को स्थापित करने के लिये अन्य राजनीतिक दलों की भांति ही कांग्रेस भी जातीय राजनीति पर उतर आयी है। समाज के हर वर्ग को पार्टी से जोडऩे के लिये जहां नेतृत्व ने पिछड़ा, दलित, ब्राह्मïण और मुस्लिम समुदाय को प्रतिनिधित्व दिया वहीं अपने ग्लैमर के चलते युवाओं को लुभाने वाले राजबब्बर को प्रदेश का अध्यक्ष बनाया। इसके अलावा ठाकुरों को आकर्षित करने के लिये पार्टी ने संजय सिंह को प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया है। 
जानकारों का मानना है कि पार्टी प्रदेश को लेकर अपनी रणनीति कांग्रेस के चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सलाह पर तैयार कर रही है। प्रशांत किशोर की टीम बीते मार्च से प्रदेश की हर विधानसभा सीट पर जातीय समीकरण का ब्यौरा हासिल करने में जुटी थी। प्रदेश कांग्रेस के लिये जमीनी स्तर पर काम कर आंकड़े जुटा चुके पीके की सलाह पर ही कांग्रेस नेतृत्व प्रदेश में पार्टी नेताओं की भूमिका तय कर रही है। पिछले दो महीनों से प्रदेश अध्यक्ष डॉ. खत्री की विदाई की खबरों के बीच डॉ. खत्री को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया। पार्टी उम्मीदवारों का चयन करने वाली स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाकर नेतृत्व ने डॉ. खत्री के पुराने कांग्रेसी होने का सम्मान बरकरार रखते हुये उनकी महत्वपूर्ण भूमिका भी तय कर दी।
अब अगर पार्टी के नये बदलाव की बात करें तो राजबब्बर जैसे जोशीले व्यक्तित्व को सामने लाकर नेतृत्व ने पार्टी में नयी जान फूंकने का प्रयास किया है। आक्रामक रवैया, तीखे बोल और जनता के बीच राजबब्बर की पकड़ का फायदा पार्टी को मिलेगा। राजबब्बर का सियासी सफर भी कम रोचक नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह से राजनीति का ककहरा सीखने के बाद राजबब्बर ने सपा मुखिया मुलायम सिंह का साथ पकड़ा। वर्ष 1994 में वे राज्यसभा सदस्य बने और वर्ष 1996 में सपा प्रत्याशी के तौर पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सामने लखनऊ से लोकसभा का चुनाव लड़े। चुनाव हार जाने के बावजूद राजबब्बर को मिले 2 लाख 76 हजार वोटों ने यह जता दिया कि वे फिल्मी दुनिया की तरह ही राजनीतिक सफर में लम्बी पारी खेलेंगे। 
राजबब्बर दो बार आगरा से सांसद रहे और वर्ष 2006 में सपा नेता अमर सिंह से खटपट के बाद सपा ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया। वर्ष 2008 में उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और फिरोजाबाद लोकसभा सीट पर हुये उपचुनाव में सपा मुखिया की बहू व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव को हराया। इससे पार्टी में उनका कद बढ़ गया। बीते लोकसभा चुनाव में वे गाजियाबाद से चुनाव लड़े, लेकिन हार गये, जिसके बाद पार्टी नेतृत्व ने उन्हें उत्तराखंड से राज्यसभा सांसद बनाया और मिशन 2017 के लिये प्रदेश कांगे्रस की जिम्मेदारी सौंपी। 
पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद के लिये दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का नाम गुरुवार को आखिरकार फाइनल कर ही दिया गया। ब्राह्मïण वर्ग से आने वाली शीला दीक्षित तीन बार लगातार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। प्रदेश में ब्राह्मïणों का 14 प्रतिशत वोट है, जिसमें से अधिकांश वोट भारतीय जनता पार्टी के खाते में जाता है। शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाकर पार्टी ने भाजपा के ब्राह्मïण वोट पर निशाना साधा है। दीक्षित वर्ष 1984 से 89 तक कन्नौज से सांसद रही। दिल्ली की मुख्यमंत्री रहते उन पर कॉमनवेल्थ खेल घोटाला और टैंकर घोटाले का आरोप लग चुका है। इस तरह अगर कांग्रेस की रणनीति पर नजर डालें तो यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि प्रदेश में अपना वजूद साबित करने के लिये कांग्रेस भी जातीय राजनीति करने में जुट गयी है।
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